एक जीवंत अध्यापक

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बात 1990 की है। तब हिंदू कॉलेज में हिंदी पढ़ने बेमन से गया था। स्वर्गीय गुरुवर पालीवाल जी ने एक संक्षिप्त साक्षात्कार के बाद प्रवेश दे दिया था। कक्षाएँ आरंभ हुई तो एक-एक कर सभी अध्यापकों से मिलना होता था। उन दिनों दुविधा में था कि हिंदी पढूँ या फिर बी०ए० प्रोग्राम में चला जाऊँ। दिल्ली में हिंदी पढ़ने से कोई खास प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती थी। इन्हीं उधेड़बुन के दिनों में गुरुवर हरीश नवल जी कक्षा में आए थे। हिंदी साहित्य पर तो वे बहुत कम बोले पर पूरी दुनिया में हिंदी की स्थिति, अध्यापन के अवसर, हिंदी की पहुँच, प्रभाव अौर क्षमता से अवगत कराया। पहली बार उन्होंने ही यह बताया था हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। विज्ञान का छात्र होने के नाते हिंदी के बारे में बहुत कम जानता था अौर सीनियर सेकेंडरी में दो वर्षों तक पढ़ने का माध्यम भी अग्रेजी ही था। खैर उनकी बात ने मेरी दुविधा खत्म कर दी अौर हिंदी ही पढ़ने का संकल्प हो गया था। बाद के वर्षों में कभी भी इसका पछतावा नहीं रहा। न ही आज है। हर अध्यापक का अपना तल है, अपनी शैली होती है। कुछ अधिक आकर्षक अौर दीप्तिमान होते हैं अौर कुछेक में जीवन का अनुभव अधिक सक्रिय होता है। हरीश जी अौर ऋतुपर्ण जी की कक्षाअों में व्यावहारिक जीवन के अनेक उदाहरण होते थे। घर में चुप्पा रहने वाला व्यक्ति नवल जी की व्यंग्य क्षमता से अवलोकित हो मुखर हो उठा था। इस व्यंग्य का असर इतना गहरा है कि घर में पत्नी भी यह वार झेल नहीं पाती। कॉलेज के सहयोगी अौर मित्र भी मेरे व्यंग्यीय आचरण से खिन्न हो जाते हैं अौर कभी-कभार तो दुश्मनी भी ठान लेते हैं। इसका बीज गुरुवर हरीश नवल जी के सानिध्य में पला-बढ़ा था। यह असर इतना गहरा है कि कई बार व्यंग्य करने के बाद पछतावा भी होता है। जब मैंने कहानियाँ लिखनी शुरू की तो उनमें भी यह प्रभाव पूरी ताकत से उभरता रहा है।

अपने पी०एचडी० के दिनों में ही नवल सर के साथ पढ़ाने का अवसर भी मिला। यह बिना उनके स्नेह अौर आशीर्वाद के संभव न था। नवल जी अौर दीपक जी चाहते थे कि मैं हिंदू कॉलेज आ जाऊँ अौर अपने ही कॉलेज में पढ़ाने का चार्म मैं भला कैसे छोड़ देता। उनका सहयोगी होने पर उन्होंने अधिक प्रोत्साहन दिया अौर अनेक मंचो पर बोलने-लिखने-पढ़ने का अवसर दिया।अनेक अवसर एेसे भी आते थे कि मैं उनकी बातों से भिन्न राय रखता था पर उसका उन्होंने कभी बुरा नहीं माना, बल्कि उस पर अधिक संवाद करने की इच्छा ही रखते थे। लंबे समय में मुझे याद नहीं कि उनको कभी क्रोध आया हो। हाँ अपनी असहमति वे जरूर दृढ़ता से प्रकट करते थे पर किसी के प्रति ‘रिवेंज’ का भाव न होता था। हिंदू कॉलेज के अध्यापकी के दिनों में ही वे कॉलेज के आवास में रहने आ गए थे। तब अक्सर शाम को चाय पीने किसी न किसी मित्र के साथ उनके घर पहुँच जाता था। सुधा मै’म चाय के साथ अन्य चीजें देना कभी न भूलती थीं। अकेला शायद ही कभी गया हूँ, दूसरे कॉलेज के मित्र वगैरह साथ होते ही थे। बिना सूचना के पहुँचना ही उन दिनों की प्रथा थी। कभी लगा नहीं कि मै’म ने बुरा माना हो। बल्कि एक उत्साह ही उनमें होता था। हँसमुख आस्था अक्सर दरवाजे पर स्वागत करती अौर प्रतीक्षा के लिए बिठाती थी।बाद में वह मेरी छात्रा बनीं। सर के घर पर गजेंद्र सोलंकी, लालित्य ललित समेत अनेक लेखक-प्रकाशक उपस्थित ही रहते थे। चाय-चर्चा साहित्य चर्चा में बदलती थी। उन्हीं दिनों मेरा समाजवादी रूझान बढ़ रहा था। नवल सर किसी विचारधारा विशेष से जुड़े नहीं थे, न अब हैं। उन्होंने मेरे समाजवादी रुझानों को प्रोत्साहित ही किया अौर बहुधा अपने अनुभव से उसे संतुलित करते रहे। वैचारिक अग्रहों को दुराग्रह में न बदल जाने में उनकी बड़ी भूमिका है। आज मेरे प्रकाशित कहानी संग्रह-तक्षशिला के तक्षक- की संकल्पना अौर शीर्षक सर के घर बैठकी की ही उपज हैं। अौर, उसमें अनुस्यूत व्यंग्य तो उनके सघन सहचर्य के बिना संभव नहीं हो सकता था।

इन दिनों तोक्यो अाने पर पता चला कि सर को कर्क ने ग्रसित कर लिया है। एएडी के अग्रज आदरणीय कृष्णलाल जी ने जब यह सूचना दी तो मैं अवाक रह गया था। सर को फोन किया पर वे शायद इलाज के लिए गए थे। मित्रवर हरींद्र से बात हुई अौर थोड़ा तसल्ली मिली। कुछेक कारणों से फेसबुक पर सक्रिय नहीं रह पाता। पर सर की सक्रियता देखकर सुखद आश्चर्य होता है। उनका सौम्य, शांत, समृद्ध अौर अाकर्षक व्यक्तित्व मुझे आज भी प्रेरित करता है। हाँ चिंता यही रहती है कि जो व्यंग्यकार उन्होंने मेरे भीतर गढ़ा है, वह ‘लंठ’ में न तब्दील हो जाए। कभी-कभी एेसा हो जाता है। गुरुवर समस्त विपत्तियों को पीछे ठेल सदा-सर्वदा सक्रिय रहें, यही प्रकृति अौर प्रभु से प्रार्थना है।

हिरोशिमा का पर्यटक

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अब

हिरोशिमा में सब सामान्य है

चलती हुई ट्राम

बहती हुई नदी

अौर पड़ोस में लहराता सागर

लोगों की आवाजाही

सड़कों पर चलता कामकाज

बसों का टिकट बाँटती

सुंदर लड़की, मुस्कराती

ज्ञापित करती धन्यवाद

बार-बार

वे दुकानों की कतारें

रेलों का आवागमन

बागीचे में सफाई करता कर्मचारी

अौर

टहलती बूढ़ी मायी

बाहर की गगन छूती इमारतें भी

सामान्य हैं

आते-जाते तस्वीर उतारते पर्यटक भी तो।

पर पर्यटक

सब एक तो नहीं

कुछ खाली कुछ भरे हुए

कुछ जिंदा कुछ मरे हुए

कुछ संकोची कुछ डरे हुए

कुछ इतिहासविज्ञ कुछ नॉर्मल

थोड़े अौसत थोड़े एबनॉर्मल

शोधार्थी भी विद्यार्थी भी

कुछ चाटते आइसक्रीम

कुछ देखते मोबाइल स्क्रीन

थोड़े सेल्फी वाले भी

दिलजले दिलवाले भी

लंबे नाटे गोरे काले भी

अकेले परिवार वाले भी

पर

वह कौन पर्यटक है हिरोशिमा का

एकांत खड़ा

प्रतीक्षारत किसी गाइड का

विचित्र

गाइड

जिसकी हड्डियाँ अभी भी हैं

बलिष्ठ

दशकों की उम्र पार कर भी

अनुभव का अथाह जल समेटे

चला आया है जो अविरल अथक

चेहरे पर झुर्रियाँ

पर चमक अौर स्वाभिमान का दर्प

बिल्कुल धँधला नहीं

हिरोशिमा की चहल-पहल में

इस गाइड को

जानने वाले ज्यादा नहीं हैं

‘मलाल है, इसका’

उस एकाकी पर्यटक ने पूछा

‘न! बिल्कुल नहीं’ जवाब था

मुझे न जाने तभी अच्छा है

क्योंकि

बताने के लिए सिर्फ वेदना ही तो है मेरे पास

इस हिरोशिमा की

जबकि, देखो

अब

सब बदल गया है

अौर यह बदलाव प्रीतिकर है

बरकरार रहे, बस।

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वह बूढ़ा गाइड

चेहरे की झुर्रियों में लिपटा

जैसे सशंकित हो उठा हो

हिरोशिमा की पुनरावृत्ति को लेकर

कहीं भी कभी भी

पर्यटक ने उस उदास चेहरे को देखा

बुद्ध का प्रतिरूप हो

ज्यों

पर्यटक बोला ‘कुछ बताइए

इस स्मारक के बारे में’

‘वह सुबह थी

झिलमिलाते सूरज की सुबह

बच्चे स्कूल जा रहे थे

किताबे लिए हाथ

भविष्य थे वे, बेहतर भविष्य हो इस धरती का

इस सपने के साथ

छोटे कदमों अौर खिलखिलाती हँसी की उमंग थी उनमें

माँए थी

जो उनकी उँगली थामे

आश्वस्त करती थीं उन्हें, भयमुक्त

घरों में वृद्ध

अपने बागीचों को सवारने में थे तल्लीन

सँवार रहे थे दुनिया का एक कोना

सड़को पर युवा

अपने जीवन अौर देश की चिंता में थे व्याकुल

सहसा

आसमान में एक गिद्ध मडराया

डैने पसारे हुए

अौर

सूरज डूब गया धरती पर

धरती का परिदृश्य

मिथक कथाअों के डेमन का संसार बन गया

अाग, धुँए के पहाड़

उठ खड़े हुए

निगल लिया

धरती की वनस्पति

हरी दूब

कली जो खिलने को ही थी

फूल भी

परिंदे, जो डालियों पर बैठे थे खामोश

अौर वे भी जो उड़ान भर रहे थे

चहकते हुए

निगल लिया

उस सायकिल पर चलते सवार को

पीछे बैठी बिटिया को

उसके हाथ में खेलती गुड़िया को

हवा में उड़ते संगीत को

अल्हड़ युवती के राग को

युवा जोड़े के अनुराग को

उनकी हस्त-गुंफित बाँहों

विरही की आहों को

निगल गया

सभ्यता के स्थापत्य को

कृत्य को अकृत्य को

नदी में चलते जल को

सब चल-अचल को

डेमन का दावानल

मांसल त्वचाएँ

बलिष्ठ भुजाएँ

मानव का दर्प

रेंगता सर्प

सपने देखती आँखें

वृक्षों की साखें

नाव में बैठा सन्यासी

आश्रम का उदासी

जंगल का वनवासी

तितली के पंख

सागर के शंख

गौरैया की चोंच

चिंतन सोच

आभूषण परिधान

समस्याएँ समाधान

चंचल चींटी

जलती अँगीठी

मसीहा की मज़लिस भी

भस्मीभूत, सारे देवदूत

इतना कह

मौन हो गया

वह

सत्तर वर्षीय वृद्ध

अनुभव सिद्ध जर्जर जड़ीभूत अटल इतिहास साक्षी

शांति अकांक्षी

अौर

पर्यटक अपलक रहा देखता उसे

महसूस करता कुछ

अजाना, अविश्वसनीय

तदाकार होता हुआ

tori

शाम

दूर मियाजिमा के उथले तट पर

मद्धिम लहरों की चपलता निहारते

गेरूए तोरण के बीच

ढलते सूरज की आहट को सुनते हुए

पर्यटक ने

टीप लिखी-

‘हिरोशिमा की वह सुबह फिर कभी न हो, न हो कभी मानव इतिहास में’

एक पुरानी कविता

 

 

८-१०-१९९८

इन शहरों में आकर हम ,दिल से कितने रीते हैं।

याद आ रहे वो दिन हमको जो गाँवों में बीते हैं।।१।।

कुदक फुदकती उड़न चिरैया,गदराए आमों की डाली

शाखा पर बैठे तोता मैना अौ अमराई की हरियाली

यहाँ बाहर से सब मधुर-मधुर है,भीतर से सब तीते हैं।याद।२।

घलर मलर खूब दूध दोहती,वो प्यारी बूढ़ी मैया

भरते कुलाचे छकड़े-छौने,वो अपनी उजली गैया

ताल तलैयों की वह छकपक अब सपनों से हो बीते हैं।याद।३।

सिर पर धानों को ढोती वह अपनी चंपा काकी

धूल उड़ाती बैलगाड़ियाँ, अल्हड़ मेलों की झाँकी

छूट गया वह सादा जीवन, टूटे मन अब सीते हैं।याद।४।

फागुन के रंग गुलाबी,देवर भाभी की गाली

गालों में रंग लगाती वह अपनी छोटी शाली

वे सच्चे संबंध भूलकर,नकली रिश्तों में जीते हैं।याद।५।

खींचमखाँच झुरमुटों की वह छेड़छाड़ अंधियारे की

चंदा की वह मंद रोशनी हँसी ठिठोली गलियारे की

मस्ती भरा वह मधुर ज़ाम था,नकली सुरा यहाँ पीते हैं।याद।६।

 

दार्जिलिंग और सिक्किम की यात्रा

जून का महीना आतेआते दिल्ली की सड़कें,बस्तियाँ और चौराहे गर्मी से उबलने लगते हैं। इस बार मन था का भारत के दूरस् हिस्से की ओर प्रस्थान किया जाय। अक्सर अपनी यात्रा की रूपरेखा मैं मानचित्र को देखकर बनाता हूँ। इसमें मेरी सहायता राहुल सांकृत्यायन,कृष्णनाथ और प्रयाग शुक्ल का साहित् करता है। जबजब भारत का नक्शा हाथ में आता सिक्किम अलग से टंगा हुआ प्रदेशरोमांच और कौतूहल पैदा करता। भोटिया जीवन के बारे में बड़े विस्तार से राहुल जी ने लिखा है। नाथू ला और पुराने सिल् मार्ग के बारे में एक तीव्र जिज्ञासा ने बहुत दिन से घेर रखा था। तिस्ता का आकर्षण भी अनेक तरह से घेरे हुए था। तो निश्चय हुआ कि इस बार सिक्किम देखा जाय। परिवार के अन् सदस्यों से बात हुई, एक लोकतांत्रिक तरीके से जिसमें छोटेबड़े सबने अपनी राय रखी। तय हुआ कि पहले दार्जिलिंग और फिर सिक्किम चला जाय। एक मित्र ने सलाह दी तो कालिमपाँग भी जोड़ दिया गया। हवाई यात्रा का भी लुत्फ उठाना था और एक निश्चित समय भी तय करना था। मुझे पहाड़ों की बारिश उसी तरह लुभाती है जैसे पहलापहला प्यार। सो, इसमें मैंने समय तय करने में अपनी चलायी और 15 जून कोकिंगफिशरसे दिल्ली से बागडोगरा की ओर उड़ जाने का निश्चय कर दिया गया।

जून की शुरुआत ही थी।दार्जिलिंग समेत पश्चिम बंगाल में भयंकर तूफानआइलाने दहशत फैला दी थी। हमारी यात्रा भी आशंकाओं से घिर गयी थी।पर, 15 जून तक सब ठीक हो चला था। दोपहर 1 बजे हमारा विमान बागडोगरा विमानपत्तन पर उतर चुका था। दिल्ली जैसी ही डरावनी गर्मी। मेरा ग्रामीण सामंती बोध भी जागृत हुआ और टाटा सूमो से ही दार्जिलिंग की ओर रुख किया गया। थोड़ी दूर,तकरीबन आधा घंटे चले होंगे कि पहाड़ी राह चुकी थी। हम आगे बढ़ते रहे,मार्ग दुर्गम होता चला गया, गर्मी छूटती चली गयी। फिर एक जगह ढेर से बादलों ने घेर लिया जैसे कि दिल्ली में दिसंबरजनवरी की धुंध भरे माहौल में होता है। हम सब पुलकित हो उठे थे। छोटी बेटी वर्तिका अब चहचहाने लगी थी।उसके अनेक प्रश् और जिज्ञासाएँ। उसकी बातें मुझे कवितासी मालूम पड़ने लगी। प्रकृति मनुष् को सहज ही कवि बना देती है।

हमारा हला पड़ावमिरिक लेकथा।यह झील बादलों के बीच कभी गुम हो जाती तो कभी इसका लहराता पानी खिलखिलाने लगता। पास ही एक स्कूल से बच्चों का एक झुंड टहलता हुआ वहाँ चला आया था।पानी और बादलों के बीच हम जो महसूस कर रहे थे,उसका साझा करने के लिए मुकम्मल शब् हमें नहीं मिले। ठंड महसूस हो रही थी और किस्मत से भुट्टे मिल गए और सबकी एक राय बन गयी कि एकएक सब खाएँगे। कुछ ऐसी ही चीजों को खाकर हमारा पेट भर गया था। ड्राइवर ने आकर हमें आगाह किया कि अब आगे बढ़े क्योंकि हमें नेपाल की एक मार्केट भी देखनी है जो शाम पाँच बजे के बाद बंद हो जाती है। हम फटाफट वहाँ से निकल पड़े और अब पशुपतिनगर की ओर हम रुख कर चुके थे।मौसम अब भी खुशनुमा बना हुआ था।

पश्चिम बंगाल की सीमा को छूता हुआ नेपाल का पशुपतिनगर दोनों तरफ आनेजाने के अत्यंत सुगम। वैसे ही जैसे आपको दिल्ली से नोएडा(.प्र.) जाना हो। मुझे लगा भारत और नेपाल सहजस्वाभाविक मित्र हैं, तो इसके पीछे इनके भूगोल की बड़ी भूमिका है। हम नेपाल की मार्केट में प्रवेश कर चुके थे। एक सामान् सा बाजार। पर परराष्ट्र की धरती का स्पर्श एक नया एहसास रच रहा था। परायापन कभीकभी जरूरी होता है।अब हम नेपाल की सीमा के साथसाथ दार्जीलिंग के रास्ते पर थे। एक जगह दो गाँव सड़क के इधर और उधर मिले ड्राइवर ने बताया कि बायीं ओर वाला नेपाल और दायीं ओर का भारत का है।एक कुत्ता सड़क पार कर रहा था। मेरे मुँह से बरबस निकला यह नेपाली है या भारतीय। हम सबका ठहाका छूट गया। धुँधलका होतेहोते हम दार्जीलिंग के अपने होटलट्रेवर्ल् इनमें पहुँच गए थे। हल्की फुहार पड़ रही थी दिल्ली परिजनों को फोन कर दार्जीलिंग पहुँचने की सूचना दी। इस सूचना में खुद के आनंद और दूसरों के दुख का साझा भी था और प्रकृति का धन्यवाद भी।

दार्जिलिंग में मौसम खुशगवार था। पर शहर के निचले हिस्से में पूरी धकमपेल थी। पहाडियाँ पूरी तरह बस्तियों से आच्छादित हो चुकी हैं। हाँ आसमान में बादलों का रेला जरूर लगा रहता है। यहाँ हमने चाय बागान देखें और उनमें सैर भी की। तिब्बती शरणार्थियों का एक शिविर भी यहाँ है। वे बड़े शानदार कालीन ऊनी कपड़ों का निर्माण यहाँ करते हैं। एक दृढ़ता और विराट संकल् आज भी उन्हें अपनी आजादी का सपना संजोने के लिए प्रेरित किए हुए है। एक जापानी मंदिर भी हमने देखा, बुद्ध का शांति संदेश रचता हुआ।

दो दिन दार्जिलिंग में व्यतीत कर हम कालिमपोंग की ओर निकल पड़े। इस शहर की चर्चा राहुल जी ने अपने यात्रावृतांतों में विस्तार कर रखी है। कालिमपोंग का मुख् बाजार दिल्ली के सदर जितना ही भीड़भाड़ वाला है और लगभग उसी तरह की वस्तुओं की खरीदबिक्री भी यहाँ होती है। देवलो की पहाड़ी यहाँ की सबसे शानदार और ऊँची जगह है। यहाँ से तिस्ता नदी का अद्भुत नजारा दिखता है। पहाड़ों के ऊपर छिपी बस्तियों उसमें रहने वाले लोगों का शांतिमय जीवन मेरे भीतर भय का संचार करता है मुझे हमेशा डर लगता हे कि मैं कभी वैराग् धारण कर लूँ। एक बार शायद 12 वीं कक्षा में था तो हरिद्वार के सतपाल महराज के आश्रम में इसी उद्देश् से पहुँच गया था। खैर, कालिमपोंग में बहुत से बौद्ध विहार हैं और फौज की छावनी भी। पर, लोग वैसे ही संघर्षरत हैं, जैसे कहीं और।

क्रमश: जारी

तोमिअोका रेशम मिल: विश्व धरोहर

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कुछ दुविधा के बाद सोचा, आज प्रकृति को छोड़ किसी अौर जगह की अोर चला जाय। इसलिए गुंमा प्रीफेक्चर में स्थित एक पुरानी सिल्क मिल देखने गया। इसे अब विश्व-विरासत का दर्जा हासिल है।तोमिअोका सिल्क मिल 1872 में बनी थी। अंदर ही क्लीनिक अौर स्त्री कर्मियों के रहने की व्यवस्था थी। उस समय के हिसाब से बड़ा विशाल प्रांगण था। रास्ते में अनेक गाँव पड़े अौर वैसे ही एक छोटी ट्रेन जो ताकासाकी नामक शहर से चलती है। तोमिअोका का कस्बा भी शांत है अौर यहाँ से लगभग पंद्रह मिनट पैदल चलकर मिल देखने पहुँचा जा सकता है। अौद्योगिक इतिहास को जानने का यह सबसे पुख्ता उदाहरण है।

बाद में लौटते हुए तकासाकी शहर को छोड़ कवागोए का रुख कर लिया। कवागोए भी सवारा गाँव की तरह एदो युग में बना-बसा गाँव है। तो मन में तुलना का भाव था कि सवारा अौर कवागोए में फर्क क्या है। किसी तरह वहाँ पहुँचा, क्योकि एक बस लेनी थी, जिसकी जानकारी मुझे नहीं थी। पर सावारा जैसा आनंद कवागोए में न है। तोक्यो के करीब होने से शहरीकरण का प्रभाव ज्यादा है। हाँ घर वैसे ही पुराने वैभव अौर एदो-युगीन स्थापत्य के साथ खड़े हैं। पर सड़क पर वाहनों की भीड़ कुछ ज्यादा ही है।

केप-इनुबो अौर सवारा गाँव

sawara1कई बार घूमने की योजना मैं मानचित्र देखकर बनाता हूँ। आज की यात्रा का प्लान भी एेसै ही बना। जापान के कंतो क्षेत्र में केप-इनुबो नामक जगह है। जो समुद्र के अंदर कुत्ते के मुँह की तरह आकृति बनाती है। इसे देखने निकले तो काफी समय यात्रा में बीतता रहा। चीबा पार करने पर गाँव का परिदृश्य। यहाँ के गाँव भी समृद्ध हैं। यानी घर पक्के, सड़क, पानी, बिजली अौर परिवहन सब हैं। चोशी नामक शहर सोया-सॉस के लिए बेहद प्रसिद्ध है। चाहें तो यहाँ सॉस बनाने वाली फैक्ट्री भी देख सकते हैं। शहर के एक छोर पर तोन नामक नदी बहती है। बहुधा सभी जापानी नदियाँ साफ हैं।

इस शहर से आगे जाने के लिए एक छोटी इलेक्ट्रिक ट्रेन चलती है। झुरमुटों से गुजरती यह ट्रेन आपको इनुबो नामक जगह ले जाती है। जहाँ से दस मिनट पैदल चलकर समुद्र का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। पास ही लाइट हाउस भी है।

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लंच के बाद हम एदो युग (1603-1868) के गाँव सवारा पहुँचे। अोनो नदी के किनारे बसे इस गाँव में प्रकृति अौर शांति का सहअस्तित्व मौजूद है। नदी तो छोटी है, पर निर्मल है। दोनों किनारों पर एक विशेष किस्म के पेड़ लगे हैं, जो इसे अौर भी मोहक बना देते हैं। अनेक घर जो उसी युग में बने थे आज भी यथावत मौजूद हैं अौर लगता है कि उनका वैभव अभी भी खंडित नहीं हुआ।

पास ही छोटी पहाड़ी पर बना देवालय भी है। अौर साथ में ही एक विशाल कांस्य प्रतिमा।

जापान का यह भाग बहुतायत में मैदानी है। दूर तक खेत दिखाई देते हैं। भारत की याद दिलाता हुआ। बस बदला हुआ यही कि रेलम-पेल नहीं है। घनघोर शांति, इतनी कि भारतीय मन घबरा जाय।

इज़ु-प्रायद्वीप

गर्मी का मौसम समुद्र तटों की अोर पलायन कर जाने का समय होता है। खास तौर पर जब छुट्टियाँ हों। भारत के बहुतेरे तट देखे हैं। मसलन पोर्ट-ब्लेयर, हैवलॉक, चेन्नई के भी कई, केरल अौर कन्याकुमारी भी। गोवा अौर मुंबई के भी। मुंबई के बीच को शहर निगल गया है। भयानक रूप से गंदा कर दिया है लोगों ने। जापान आने बाद तोक्यों की खाड़ी में अोदाइबा का बीच देखा। साफ है, पर विहंगम दृश्य गायब है। फिर जगह-जगह के बीच उदाहरणत: कामाकुरा अौर एनोशिमा के सुंदर बीचों का साक्षात्कार हुअा। दोनों तोक्यो के पास हें अौर मोहक हैं। अोसाका का बीच भी देखा, पर वह वैभव कहाँ। इस बार हिरोशिमा के पास स्थित मियाज़िमा गया तो भव्य श्राइन, पर्वत-शिखर अौर विराट सागर को एक साथ देखने का अवसर मिला। नयनाभिराम दृश्य था अौर बारिश के धुंधलके में भी उसका असीम सौंदर्य़ झलकता था। पर अज्ञेय जी ने इज़ू को बड़े मनोभाव से याद किया है। तो बस इसे देखने का मन था। अौर कहना होगा कि वे गलत नहीं थे।

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[अतामी का सागर-तट। सागर के बीच में एक द्वीप है जिस पर मिहारा पर्वत स्थित है]

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[अोमुरो पहाड़ जो 360 डिग्री का दृश्य बनाता है।]           izu

[केगोन का अविस्मरणीय सागर]

 इजू-प्रायद्वीप की यात्रा पर निकला हूँ। शीलू भी साथ थी। पहले तो अतामी तक जाने की योजना थी पर हम अौर आगे निकलते चले गए। अंतत: हम इजू-केगोन गए, जहाँ 360 डिग्री वाला एक अोमुरो पहाड़ है। हरा-भरा। ऊपर जाने का समय तो नहीं था। हमें केगोन बीच देखना था। जहाँ एक सस्पेंशन पुल भी है। नयनाभिराम दृश्य था। स्टेशन से लगभग आधा घंटा चलने पर हम बीच पहुँचे थे, पर किनारे की उत्ताल लहरों ने मनमोह लिया। दूर-दूर तक पसरे समुद्री किनारे ने नजरों को कैद कर लिया। शायद इसी स्थान का वर्णन अज्ञेय जी ने अपनी पुस्तक में किया है। वे चाहते थे कि यदि मौका मिले तो वह यहाँ रह सकें। एक अोर अोमुरो पहाड़ अौर दूसरी अोर अपार समुद्री प्रसार। यही तो कवि की चाहना थी।

यहाँ के बाद हम इतो नामक प्रशांत शहर आ गए। यहाँ एक पुराना दिगम्बरी-स्नानगार था, जो अब एक दर्शनीय स्थल बन गया है।इतो में जैसे सागर अौर जमीं एक दूसरे को पुचकारते हैं।

फिर शाम होते-होते अतामी के तट पर। जहाँ कानइचि अौर अोमिया की ट्रैजिक प्रेम कहानी का स्मारक बना हुआ है। तट से ही अतामी किले को निहारता रहा अौर लेटे-लेटे आसमान देखता रहा। शुभ्र-नीला आसमान। अनेक दिगम्बरी-स्नानागार हैं यहाँ। पर नहीं जा सका।हाँ, राह चलते गंधक-जल की खुशबू जरूर मन को तरोताजा करती रही। कभी यहाँ जरूर रात्रि-विश्राम करूँगा। सेक्स म्युजियम भी है पर, क्या करना। रात घर आ गया। यह सब सेइसुन जू-हाची किप्पू (युवाअों के लिए रियायती टिकट) की वजह से संभव हो पाया।

हिंदी फिल्में –भाषा, साहित्य और संस्कृति की लोकदूत

फिल्में एक ऐसे कला मायम के रूप मंे हमारे सामने उपस्थित है, जिसमें अनेक कलाओं का पड़ाव दिखाई देता है। भाषाई और रूपकर कलाएँ तो फिल्में में हमेशा ही अपना दखल रखती आयी हैऋ परंतु साहित्यिक कृतियों के सिनेमाई रूपांतरण, सिनेमा में बोलियों और आंचलिकता की अनुगूँज, गीतों का निर्माण एवं प्रसार, भाषा–भाषी समाज की कलात्मक अभिरूचि एवं कला मानकों का विकास, सांस्कृतिक रंगो–वनियों की उद्भावना और संदेश संप्रेषण तथा शिक्षण प्रक्रिया के द्वारा भाषा, साहित्य और संस्कृति का गठन फिल्मों का महत्वपूर्ण अवदान माना जा सकता है। हिन्दी फिल्में भी अपनी इस भूमिका में पीछे नहीं है।
हिन्दी फिल्में ;अध्किांशत: जिनका उत्पादन संगठित/औद्योगिक रूप में मुबंई में होता है, जिसे ‘बॉलीवुड’ भी कहा जाता हैद्ध, हिन्दी भाषा ;दुनिया की तीसरी सबसे अध्कि बोली जाने वाली भाषाद्ध ही नहीं, अपितु हिन्दी जाति ;जो मूलत: भारत के उत्तरी क्षेत्रा में निवास करती हैद्ध के जीवन सरोकारों, स्पंदन, भावात्मक संचार, आर्थिक स्थिति एवं वैचारिक बनावट को दर्शाती है। बॉलीवुड, जहाँ हिंदी फिल्मों का औद्योगिक निर्माण होता है, हिंदी फिल्मों का क्षेत्राीय सीमाओं, भौगोलिकों बायताओं एवं भाषाई घेरेबंदी को चटखा देता है। हिंदी फिल्में के निर्माण व वितरण में हिंदीतर भाषा–भाषी लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फिल्म निर्माण एक सामूहिक कार्य है इसलिए हिंदी फिल्में भारत और कई बार भारत के बाहर से भी मानव संसाध्नों का उपयोग करती हैं। इसके चलते हिंदी फिल्मों की कुशलता, प्रभावोत्पादकता काफी बढ़ जाती है। अभिप्राय यह कि हिंदी फिल्म संसार भारतीय विविध्ता में एकता के सूत्रा विकसित करता है। विभिन्न भाषाई भौगोलिक समूहों को इकट्ठा करके उनमें आपसी समन्वय स्थापित करता है। इस प्रकार हिंदी फिल्में अन्य क्षेत्राीय भाषाओं बंगला, तमिल, कन्नड़ आदि की तुलना में अध्कि विस्तृत लक्ष्य को प्रस्तावित करती हैं। जहाँ हम बाकियों को क्षेत्राीय सिनेमा कह सकते हैं वहीं अपनी निर्माण प(ति और उद्यमी चरित्रा के चलते तथा समस्त भारतीय प्रतिनिध्त्वि ;अभिनय, संगीत, तकनीक, संपादन, वितरणद्ध के समाहार होने के कारण हिंदी फिल्मों को राष्ट्रीय ;न कि केवल उत्तर भारतीयद्ध सिनेमा कहना पड़ेगा। हिंदी फिल्मों को राष्ट्रीय सिनेमा कहना सर्वथा समीचीन भी है क्योंकि इन फिल्मों के दर्शक भारतीय भूखंड के हर हिस्से में मौजूद हैं। वेलोग भी जिन्हें न तो ठीक से हिंदी लिखनी, पढ़नी, बोलनी आती है वे भी हिंदी फिल्में देखते हैं और उसका संदेश ग्रहण करने में सक्षम होते हैं। साथ ही, हिंदी फिल्में राष्ट्रीय विमर्श के मुद्दों को लगातार गंभीरता और सहजता से उठाती है। भारत की राष्ट्रीय संस्कृति, सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक घटनाचक्र का बैरोमीटर बनकर हिंदी फिल्में भारतीय राष्ट्र की मुख्य चिंताधरा का उद्घाटन करती हैं। अपने इन्हीं गुणों के चलते हिंदी फिल्में सच्चे अर्थों में भारत के राष्ट्रीय सिनेमा से अभिहित किया जाता रहा है। फिर भी, अपनी भाषाई बनावट के चलते हिंदी फिल्में हिंदी भाषी समूहों में सर्वाध्कि लोकप्रिय हैं।
भाषा प्रसार उसके प्रयोक्ता–समूह के संस्कृति और जातीय प्रश्नों को साथ लेकर चला करता है। हिन्दी फिल्में निश्चय ही हिन्दी भाषा के प्रचार–प्रसार में अपनी विश्वव्यापी भूमिका का निर्वाह कर रही हैं। उनकी यह प्रक्रिया अत्यंत सहज, बोध्गम्य, रोचक, संप्रेषणीय और ग्राह्य हैं। हिन्दी ;हिन्दी यहाँ भाषा, साहित्य और जाति तीनों अर्थों में ली जा सकती है।द्ध के प्रचार–प्रसार के मायम के रूप में जब हम हिन्दी फिल्मों पर दृष्टिपात करते हैं तो निम्नलिखित मुद्दे महत्वपूर्ण ढंग से उभरते हैं
1. भाषा का प्रचार–प्रसार
2. साहित्यिक कृतियों का फिल्मी रुपांतरण
3. फिल्मी गीतों की लोकप्रियता
4. हिन्दी की उपभाषाओं, बोलियों का सिनेमा
5. कलात्मक आलोचनाशास्त्रा का निर्माण
6. सांस्कृतिक एवं जातीय प्रश्नों को उभारने में हिंदी फिल्मों का योगदान
हिन्दी फिल्मों में वनि का आगमन हालांकि 1931 ई. ;आलम आरा, आर्देशिर ईरानीद्ध में होता है परंतु 1912 में ही दादा साहब पफाल्के की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ ;भारत की पहली फीचर फिल्मद्ध में उपशीर्षकों की भाषा हिन्दी की उस विशिष्ट शैली ;जो आज बोलचाल में प्रयोग होती है तथा जिसमें विश्वस्तर पर पनपने की संभावना है, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भी स्वीकृत कराया जा सकता हैद्ध के दर्शन होते हैं, जो बाद में हिन्दी भाषी समूहों में लोकप्रिय होती चली गई। इस फिल्म के शीर्षकों को देखें तो हम पाते हैं कि इसमें लगभग 95 शब्दों का प्रयोग हुआ है, उनमें से 8 उदू‍र् में है बाकी संस्कृत और हिन्दी के है। ‘साड़गता’ शब्द मराठी भाषा का है। एक–दो शब्दों में वर्तनी की अशु(ता भी है। पहली फिल्म में ही भाषा की व्यापकता हमें दीखती है। हिंदी फिल्मों ने हिन्दी की ऐसी भाषा–शैली विकसित करने और उसे गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों, भारतेत्तर जसमूहों में प्रचलित करने में मदद की जो आज हर जबान से पफूटती हैं।
हिंदी फिल्मों की भाषा को लेकर भी भ्रम पैदा किया जाता रहा है। अपने हाल के ही एक लेख में प्रो. हरीश त्रिावेदी ने इस भ्रम का तर्कसंगत निराकरण किया है कि हिंदी फिल्मों की वास्तविक भाषा उर्दू है। फिल्मों के नामकरण, संवाद, लेखन और गीतों के विश्लेषण से कुछ फिल्म विचारकों ने सि( किया था कि हिंदी फिल्मों को कायदे से उदू‍र् फिल्म कहा जाना चाहिए लेकिन न तो नामकरण और न ही संवादों के आधर पर यह सि( किया जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में उदू‍र् का वर्चस्व है। गीतों में अवश्य ही उदू‍र् शब्दों की प्रचुरता दिखाई देती है लेकिन इस उदू‍र् को हिंदी के निकट कहा जा सकता है।
फिल्में भाषाई प्रचार को गति कैसे देती है? इस प्रश्न का उत्तर सापफ है कि फिल्में मात्रा मौखिक भाषा का ही आलंबन नहीं ग्रहण करती वरन् मौखिक भाषाओं के साथ दृश्य भाषा पूरक के रूप में साथ–साथ चला करती है। हिंदी फिल्मों ने भी बड़े अनुभव के बाद अपनी दृश्य भाषा का निर्माण एवं गठन सुनिश्चित किया है। हम अपनी आम बातचीत के दौरान भी दृश्य भाषा का प्रयोग करते हैं। मसलन यहां या वहां बैठने के लिए तर्जनी के संकेत ‘यहां’ के लिए तर्जनी क साथ अन्य अंगुलियां भी साथ जुड़ी होती हैं जबकि ‘वहाँ’ केसंकेत में वह अकेली और तनी हुई होती है। यदि संदर्भ बैठने ;स्वागतोपरांत आदिद्ध का हो तो हम किसी भी भाषा में बोलते हुए इस तरह की देह भाषा का प्रयोग करते हैं। मौखिक भाषा को न जानने वाला या कम जानने वाल व्यक्ति संकेतों को ग्रहण करते हुए भाषाई आरोह और अवरोह के आधर पर पूरा अर्थ समझ जाता है। फिल्मों में दृश्य की ताकत मौखिक भाषा की बाधओं को दूर कर उसे अध्कि संप्रेषण बना देती है इसलिए वे निभाषी समूहों तक अपने अर्थ का प्रकाशन संभव कर पाती है। हिंदी फिल्मों की दृश्यता हिंदी भाषा के अर्थ प्रसार में सहायक रही है। भारत में प्रतीकों की प्रचुरता और प्राचीनता अर्थ संप्रेषणीय में कारगर सि( हुई है। इन प्रतीकों उदाहरणत: ‘शिवलिंग’ या ‘बांसुरी’ की वर्तनियाँ भिन्न होने के बावजूद उन्हें पूरे भारत के लोग ग्रहण कर लेते है। हिंदी फिल्मों ने इस प्रतीकात्मकता को अपनाकर अपनी संप्रेषणीयता गैर हिंदी भाषी क्षेत्राो में सुनिश्चित की है। दृश्य भाषा के विकास और प्रतीकात्मकता बुनावट के सहारे हिंदी, हिंदी फिल्में  के मायम से उन जनसमूहों में समादृत और लोकप्रिय हुई जो किसी अन्य मायम से संभव न थी।
हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी साहित्य को भी आम लोगों ;वे लोग भी जो निरक्षर है या फिर हिन्दी पढ़ नहीं सकते – या पढ़ना नहीं चाहते, देशी–विदेशी दोनोंद्ध तक पहुँचाने में सपफलता अर्जित की है। हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों – शतरंज के खिलाड़ी, तीसरी कसम, चित्रालेखा, सूरज का सातवाँ घोड़ा, माया दर्पण, तमस, सारा आकाश पर फिल्में बनी हैं। हिंदी साहित्य का व्यापक प्रसार पूरे विश्व में फिल्मों के जरिए हुआ है।
साहित्यिक कृतियों का सिनेमाई रूपांतरण  साहित्य को नई संचारात्मक और संप्रेषण शक्ति प्रदान कर देता है। निरक्षर लोग और गैर भाषाई लोगों तक भी साहित्य की पहुँच इसके पफलस्वरूप हो जाती है। यदि देखें तो हम पाते हैं कि साहित्य–संरचना का मूलाधर भाषा है जबकि वहीं साहित्य जब फिल्मी पर्दें पर आता है तो दृश्य उसके केंद्र में होता है। भाषाओं का भूगोल सीमित और दृश्यों का व्यापक होता है। जरूरी नहीं कि दृश्य हमेशा असीमित भौगोलिक विस्तार को संबोध्ति करने की क्षमता रखते हैं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अंडमान द्वीप के कई आदिवासियों ने अपने ऊपर से उड़ते हवाई जहाज को देखा तो उन्होंने इसे विराट पक्षी के रूप में परिकल्पित किया। दृश्य  यथार्थ विम्बों के अभाव में अपना अर्थ संप्रेषण नहीं कर सकते हैं लेकिन भाषा कि तुलना में वे अध्कि संप्रेष्य कहे जा सकते हैं। पहाड़, पेड़, पक्षियों के दृश्य पूरी मानवता को संबोध्ति कर सकते हैं लेकिन हवाई जहाज सीमित लोगों की पहुँच के चलते सीमित लोगों तक ही अपने अर्थ का प्रतिपादन करने में सक्षम होते हैं। माथे की विंदी  एक सांस्कृतिक प्रतीक होने के चलते भारत के विभिन्न भाषा–भाषी समूहों पर सहज ही अर्थ प्रकट कर सकती है परंतु पश्चिमी दुनिया के लिए उसका अर्थ व अभिप्राय लगाना कठिन होता है। संस्कृति विम्बों के द्वारा निर्मित होती है, भाषा उनकी सहायक होती है। हिंदी साहित्य की महान् कृतियों का फिल्म विध में रूपांतरण उनकी लोकप्रियता और पहुँच को सुनिश्चित करता है। ‘तीसरी कसम’ पफणीश्वरनाथ रेणु की महत्वपूर्ण कहानी है इसी पर बासु भट्टाचार्य ने जब फिल्म का निर्माण किया तो वह गैर हिंदी भाषियों के लिए भी सहज–सप्रेष्य हो उठी। उसमें गानों ने अतिरिक्त ऊर्जा का समावेश करा दिया और उनकी व्यापकता को सुनिश्चित कर दिया। अभिनय, संगीत, दृश्यांकन ने मिलकर इस कहानी का कायाकल्प कर दिया। कहानी में अनेक मार्मिक स्थल ;स्टेशन पर हीरामन, हीराबाई का विछोह आदि भारतीय समाज के स्मृति पटल पर सदैव के लिए अंकित हो गए।द्ध
फिल्मी गीत अपनी संगीतात्मकता के चलते अध्कि संचारात्मक प्रकृति के होते हैं। हिन्दी फिल्मी गीत उन लोगों की जबान भी चढ़े दिखाई देते हैं जिन्होंने हिन्दी को कभी व्यवस्थित ढंग से पढ़ा नहीं। इन गीतों के मायम से हिन्दी दुनिया के विभिन्न भागों तक पहुँची। गीत – आसानी से हमारी स्मृति का अंग बन जाते हैं इसलिए भाषाई प्रचार–प्रसार का सहज, दीर्घजीवी मायम बनते हैं। हिन्दी फिल्मी गीतों में भी यह गुण विशेषतौर पर मौजूद है। कोई भी समाज या राष्ट्र अपने गीतों के मायम से अपने हृदय को खोलता है। पहले निम्न गीतों पर एक दृष्टि डालते हैं
 जब दिल ही टूट गया ;1946, शाहजहाँद्ध
 वतन की राह में वतन के नौजवों ;1948, शहीदद्ध
 लारा लप्पा, लारा लप्पा ;1949, एक थी लड़कीद्ध
 मेरे पिया गए रंगून, किया है ;1949, पतंगाद्ध
 तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं ;1950, बावरे नैनद्ध
 तू गंगा की मौज, मैं जमुना का ;1952, बैजूवावराद्ध
 दे दी हमें आजादी ;1954, जागृतिद्ध
 मेरा जूता है जापानी ;1955, श्री 420द्ध
 डम डम डिगा डिगा, मौसम ;1960, छलियाद्ध
 इंसापफ की डगर पर ;1961, गंगा–जमुनाद्ध
 मेरा रंग से बसंती चोला ;1965, शहीदद्ध
 सजन रे झूठ मत बोलो ;1966, तीसरी कसमद्ध
 झूठ बोले कौवा काटे ;1973, बॉबीद्ध
 मैं तो आरती उतारूं रे ;1975, जय संतोषी माँद्ध
 दीदी, तेरा देवर दीवाना ;1990, हम आपके है कौनद्ध
 ईलू ईलू ;1990, सौदागरद्ध
उपरोक्त गीत बदलते सामाजिक परिदृश्य के साथ–साथ अपनी लोकप्रियता का संकेत भी करते हैं। अपने संगीतात्मक विधन, खूबसूरत शिल्प और संचारध्र्मी तेवर के चलते ये गीत भाषाई समूहों के साथ–साथ विभाषाई जनों तक पहुँचे और उनका कण्ठहार बने। इन गीतों में निजी दर्द के साथ राष्ट्रीयता, अयात्मिकता, सामाजिक संबंध्, जीवन–मृत्यु के प्रश्न, कॉमेडी और वनयात्मक सरंचनाओं को सहज ही देखा जा सकता है। गीतों को जब संगीत का आलंबन मिलता है तो उनकी यात्राा लंबी हो जाती है। वे अपने इतिहास और भूगोल का अतिक्रमण करने की क्षमता अर्जित कर लेते है। हिंदी फिल्मी गीतों ने देश और विदेश की लंबी यात्रााएं करने में सपफलता पायी है। इनके मायम से हिंदी भाषा और संस्कृति भावपूर्ण प्रवाह के रूप में जन–जन तक पहुँची।
आज हिन्दी–जनसंचार के जितने भी मायम है उनमें हिंदी की उपभाषाओं/बोलियों का प्रयोग निरंतर क्षीण हुआ है। संभवत: यह माना जा चुका है कि बोलियाँ समूह के निजी संप्रेषण के लिए ही रह गई है। लेकिन, हिन्दी की बोलियों  भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, राजस्थानी, बुंदेली, हरियाणवी, मैथिली में बनने वाली फिल्मों ने इन्हें नया जीवन प्रदान किया। हिन्दी की ये बोलियाँ फिल्मों के मायम से न अपनी अस्तित्व रक्षा कर रही है वरन् हिन्दी भाषा के वैविय को बचाए रखने, उसके शब्द भंडार मे इजापफा करने और हिन्दी की व्यापकता के सुनिश्चय में लगी हुई है।
हिंदी की उपभाषाओं में फिल्मी नजरिए देखे तो भोजपुरी सर्वाध्कि महत्वपूर्ण उपभाषा के रूप में उभरती है। आजादी के पहले ही मोतीलाल बी.ए. ने ‘नदिया के पार’ नामक फिल्म में भोजपुरी गीतों का समावेश करवा दिया था और फिर भोजपुरी भाषा संवादों और गीतों के मायम से हिंदी सिनेमा में लगातार बनी रही। भोजपुरी फिल्म का व्यवस्थित निर्माण 1962 में गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबे मे होता है, इसके बाद की अनेक महत्वपूर्ण फिल्म कृतियाँ  ‘लागी नाही छूटे राम’, ‘कब होई है गवनवा हमार’, ‘भौजी दंगल’, ‘गंगाकिनारे मोरा गांव’, ‘राखी की लाज’, ‘बलम परदेसिया’, ‘भईया दूज’, ‘तुलसी सोते हमार अंगना’। हमारे समक्ष आयी। भोजपुरी फिल्में न केवल भारत वरन् मॉरीशस और त्रिानिडाड में भी लोकप्रिय हैं और इस प्रकार हिंदी भाषा के ही एक रूप का विस्तार कर रही हैं।
मैथिली भाषा की फिल्मों के निर्माण का प्रयास 1964 में माना जा सकता है जब ममता गाबय गीत, ;निर्देशक परमानंदद्ध को बनने का उद्यम हुआ। मैथिली फिल्में अपनी शैशवावस्था में हैं लेकिन कन्यादान ;1964द्ध और ‘सस्ता जिनगी महंगा सिनूर’ ;1999, बालकृष्ण झा निर्माताद्ध मैथिल भाषा में फिल्म निर्माण की संभावनाओं को रचते है। भक्ति और श्रृंगार के अनूठे कवि विद्यापति की भाषा फिल्मी पदें‍र् पर आकर अध्कि लोकप्रिय व जन संप्रेषी हो सकेगीद्ध
हरियाणवी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी सिनेमा भी प्रकारांतर से हिंदी के प्रचार–प्रसार को ही सुनिश्चित कररहे हैं। हरियाणवी सिनेमा की ‘बहूरानी’ ‘सांझी’, ‘चंद्रावल’, ‘जर जोरू और जमीन’ जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों ने हरियाणवी भाषी हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के कुछ हिस्सों में अत्यंत लोकप्रियता अर्जित की है। सन् 2000 में प्रदर्शित ‘लाडो’ को राष्ट्रीय पुरस्कार ;डेब्यू निर्देशक  अश्विनी चौध्रीद्ध भी मिला। छत्तीसगढ़ी फिल्में के पितामह मनुनायक और किशोर साहू माने जाते है। छठवें दशक के अंतिम वर्षों में प्रदर्शित ‘कवि देवे संदेश’ ;मनु नायकद्ध एक महत्वपूर्ण तथा पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कही जा सकती है, ‘घर–द्वार’, ‘छइया–भुइया’ ;निर्देशक सतीश जैन, 2000द्ध एक महत्वपूर्ण छत्तीसगढ़ी फिल्म है जिने अपने अंचल के बाहर भी व्यवसाय किया। ‘भोला छत्तीस गढि़या’ ‘मयाज भौजी’ और ‘परदेसी के गया’ आदि फिल्मों के छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को बल प्रदान किया है।
हिंदी बोलियों का सिनेमा अपने सीमित संसाध्न और तकनीकी अपरिपक्वता के चलते भले ही कोई राष्ट्रीय, अन्र्तराष्ट्रीय पहचान न बना पाया हो परंतु इन बोलियों की शक्ति को बचाए रखने की संभावना उसने जरूर दिखाई है। जरूरत है कि क्षेत्राीय बोलियों में अध्किाध्कि सिनेमा बने जिससे हिंदी भाषा का वटवृक्ष और भी ऊर्जा–स्रोत विकसित कर सके। बोलियों में बनने वाला सिनेमा अन्तत: हिंदी भाषा को ही समृ( करता है और राष्ट्रीय एकता को दृढ़ता प्रदान करता है।
भाषा के भीतर संस्कृति का प्रच्छन्न प्रवाह बना रहता है। हिंदुस्तानी समाज के विभिन्न मुद्दे राष्ट्रीयता, आतंकवाद, सामाजिक ढाँचा, पारिवारिक रिश्तें, कृषि–किसान, औद्योगिकरण, बाजारवाद और भूमंडलीकरण,  प्रवासी जीवन आदि हिन्दी फिल्मों में उठते रहे हैं। अपने कथानक की बनावट और भाषाई अभिव्यक्तियों में हिन्दी फिल्में इन मुद्दों के प्रति हमारा यान आकर्षित करती रही हैं। हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी भाषा के प्रचार–प्रसार के साथ हिन्दी भाषी समुदाय की चुनौतियां, संघर्ष–सपनों और चाहतों को भी विश्व पफलक पर पहुँचाया है। हिन्दी भाषा का विश्वव्यापी प्रसार इस समुदाय के मुद्दों को संबोध्ति किए बिना अधूरा ही माना जाता, लेकिन हिंदी फिल्मों ने अपनी इस भूमिका का बखूबी निर्वाह किया है।
दुनिया की कोई भाषा नए माहौल से अनुकूलन किए बिना जिंदा नहीं रह सकती। समाज में नयी हलचलों को पहचानने और उनके अभिलेखन के लिए भाषा को अपना ताना बाना बदलना पड़ता है। जब समाज और राष्ट्र नयी तकनीकी, कलात्मक, सांस्कृतिक जरूरतों की अपरिहार्यता से गुजरते है तब सक्षम भाषाएँ उनका साथ देने के लिए अपने नए अवतार में उपस्थित हो जाती हैं। हिंदी भाषा भी नव्यतम् चुनौतियों के वहन के लिए नयी विधओं और नए रूपों में हमारे सामने आयी है। हिंदी भाषा में फिल्म निर्माण के साथ हिंदी ने उदू‍र् को प्रमुख सहायिका बनाया, गीतों और संवादों के लिए, दृश्यता का समावेश किया, भाषा और बिम्ब के अन्तर संतुलन की पहचान की, नई तरह की शैलियों – मुबंइया को भी मानक बनाया, नए तरह के कोड, बिम्ब, प्रतीक, मितकथनों को ईजाद किया। पटकथा, संवाद और गीत लेखन जैसी नयी विधओं को सृजनकिया हिंदी भाषा को तकनीकी अनुकूलन के लायक बनाया इसलिए हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा के सर्वथा नए रूप रंग, और  संाचे–ढांचे को गढ़ा है। हिंदी साहित्य और भाषा पर हिंदी फिल्मों का गहरा प्रभाव पड़ा है। हिंदी फिल्मो हिंदी के आलोचना शास्त्रा के लिए कई मानक प्रदान किए हैं। इन मानकों को नयी         विधओं के रूप में तथा दृश्यता, मित कथन, संवादध्र्मिता आदि कई रूपों मे चिन्हित किया जा सकता है।

 

किसी भी भाषा, साहित्य का विकास उसके आलोचना–शास्त्रा के बिना संभव नहीं होता। आलोचना शास्त्रा के मानदंडों का निर्माण भाषाई समूह के विविध् कलारूप तय करते हैं। हिन्दी भाषा की संचारात्मकता, शैली, वैज्ञानिक अययन, जन संप्रेषणीयता, पटकथात्मकता के निर्माण, संवाद लेखन, दृश्यात्मकता दृश्य भाषा, कोड निर्माण, संक्षिप्त कथन, विम्ब ध्र्मिता, प्रतीकात्मकता, भाषा–दृश्य की अनुपातिकता आदि मानकों को हिन्दी फिल्मों ने गढ़ा है। ‘इंडियन डायसपोरा’ विश्वस्तर पर एक नयी अवधरणा और सच्चाई है। हिन्दी फिल्में  हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति का लोकदूत बनकर इन तक पहुँचने की दिशा में अग्रसर हैं।